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UGC का विरोध, सामान्य वर्ग (जनरल कैटेगरी) के बच्चों के भविष्य के लिए !

झूठा/फालतू आरोप लगाने पर कोई विशेष सजा नहीं ! ड्राफ्ट में false/frivolous complaint पर penalty का क्लॉज था, लेकिन फाइनल नियम (जनवरी 2026) में हटा दिया गया—पीड़ित बिना डर के शिकायत करें, इसलिए safeguard नहीं रखा। झूठी शिकायत पर IPC 182/211 (झूठी रिपोर्ट/मानहानि) या कॉलेज के आंतरिक नियम लागू हो सकते हैं, लेकिन UGC में कोई penalty नहीं। अगर SC/ST/OBC छात्र जनरल छात्र को जातिगत भेदभाव करता है UGC नियम में कोई सीधा प्रावधान नहीं। ये एक तरफा  है, जनरल के लिए जाति पर कोई प्रोटेक्शन नहीं।   सामान्य वर्ग (जनरल कैटेगरी) के खिलाफ जातिगत भेदभाव (गाली, बहिष्कार, हारासमेंट) को UGC नियम में कवर नहीं किया गया।  जातिगत भेदभाव की परिभाषा (Regulation 3(c)): सिर्फ SC, ST, OBC के खिलाफ जाति/जनजाति आधारित भेदभाव को कवर करता है।  बच्चों के भविष्य के लिए  अगर जनरल कैटेगरी में बच्चे हैं, तो विरोध/जागरूकता/कानूनी रास्ता अपनाना उचित है—झूठे आरोप  से पढ़ाई/करियर प्रभावित हो सकता है। शांतिपूर्ण तरीके से आवाज उठाएं, ताकि नियम सभी के लिए बराबर और सुरक्षित बनें। ये कदम उठाकर सरकार वि...

शेयर बज़ार में कैसे लिस्ट होती है कोई कंपनी?

IPO की प्रक्रिया, नियम और वैल्यूएशन को समझें

भारत में शेयर बाजार में IPO एक महत्वपूर्ण वित्तीय प्रक्रिया है, जहां कंपनियां पहली बार अपने शेयर जनता को बेचती हैं। यह न केवल कंपनियों को पूंजी जुटाने का अवसर देता है, बल्कि निवेशकों को भी निवेश के नए अवसर प्रदान करता है।
कौन सी कंपनियां IPO ला सकती हैं?
भारत में, कोई भी कंपनी, चाहे वह निजी हो, सरकारी हो, नई हो, पुरानी हो, बड़ी हो, मझोली हो, या छोटी हो, IPO ला सकती है, बशर्ते वे SEBI द्वारा निर्धारित नियमों का पालन करें। विशेष रूप से, SME के लिए 2025 में नए नियम लागू हुए हैं, जिसमें कंपनियों को पिछले तीन वित्तीय वर्षों में से कम से कम दो वर्षों में ₹1 करोड़ का ऑपरेटिंग लाभ दिखाना होगा।
IPO के नियम क्या हैं?
IPO लाने के लिए, कंपनियों को SEBI के पास ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) दाखिल करना होता है, जो कंपनी के वित्तीय और ऑपरेशनल डेटा को प्रस्तुत करता है। कंपनी को न्यूनतम 3 साल का ऑपरेशनल रिकॉर्ड और वित्तीय पारदर्शिता दिखानी होगी, ताकि निवेशकों को विश्वास हो सके। IPO के लिए शेयरों की संख्या, मूल्य बैंड, आवेदन तिथि, अलॉटमेंट, और रिफंड तिथि जैसे विवरण घोषित करने होते हैं। इसके अलावा, लिस्टिंग का समय T+6 दिनों से घटाकर T+3 दिन कर दिया गया है, जो 1 दिसंबर 2023 से अनिवार्य है, ताकि निवेशकों को जल्दी शेयर मिलें और कंपनियां जल्दी फंड का उपयोग कर सकें।
IPO प्राइस कौन और कैसे तय करता है?
IPO की कीमत कंपनी के प्रबंधन और अंडरराइटर्स मिलकर तय करते हैं, जो बाजार की मांग और कंपनी के वैल्यूएशन को ध्यान में रखते हैं। दो मुख्य तरीके हैं :
फिक्स्ड प्राइस IPO : कंपनी एक निश्चित मूल्य तय करती है, जो आमतौर पर छोटे IPO में उपयोग होता है।
बुक बिल्डिंग IPO : इसमें एक मूल्य बैंड तय किया जाता है, जैसे 427-450 रुपये प्रति शेयर, और निवेशक इस बैंड में बोली लगाते हैं। अंतिम कीमत निवेशकों की मांग, कंपनी के डिस्काउंटेड कैश फ्लो (DCF) वैल्यूएशन, फाइनेंशियल हेल्थ, और मार्केट ट्रेंड्स पर आधारित होती है। एंकर निवेशकों की प्रतिक्रिया भी कीमत निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, क्योंकि वे बड़ी मात्रा में शेयर खरीदते हैं और बाजार के विश्वास को बढ़ाते हैं। कीमत निर्धारण में कंपनी की ग्रोथ संभावनाएं, सेक्टर का प्रदर्शन, और आर्थिक स्थिति जैसे कारक भी शामिल होते हैं।
लिस्टिंग की वैल्यू कैसे तय होती है?
लिस्टिंग वैल्यू, जो शेयर लिस्टिंग के दिन बाजार में उसकी कीमत है, कई कारकों पर निर्भर करती है जैसे IPO के दौरान तय की गई कीमत और बैंड लिस्टिंग वैल्यू का आधार बनते हैं, ओवरसब्सक्रिप्शन, अगर बाजार बुलिश है, तो लिस्टिंग वैल्यू ऊंची हो सकती है, जबकि बेयरिश मार्केट में यह कम हो सकती है। निवेशकों की रुचि और बाजार की स्थिति भी लिस्टिंग वैल्यू को प्रभावित करती है। अगर मांग ज्यादा है, तो वैल्यू बढ़ सकती है। कंपनी जिस सेक्टर में है, उसका समग्र प्रदर्शन और भविष्य की संभावनाएं कीमत तय करने में मदद करती हैं।
कंपनी की फंडामेंटल्स : कंपनी का राजस्व, लाभ, प्रबंधन की विश्वसनीयता, और सेक्टर की ग्रोथ लिस्टिंग वैल्यू को प्रभावित करते हैं।
वैल्यूएशन मेथड्स : भविष्य के कैश फ्लो को वर्तमान मूल्य में कन्वर्ट करके वैल्यू निकाली जाती है। कंपनी की कमाई के आधार पर तुलनात्मक वैल्यूएशन। उसी इंडस्ट्री की दूसरी कंपनियों की वैल्यू से तुलना।

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