रंगमंच व सांस्कृतिक आदान-प्रदान को आगे बढ़ाने को मनाते हैं यह दिन
इसकी शुरुआत 27 मार्च 1962 में इंटरनेशनल थिएटर इंस्टीट्यूट द्वारा की गई थी। इस अवसर पर किसी प्रसिद्ध रंगमंच व्यक्तित्व द्वारा वैश्विक संदेश दिया जाता है, जो रंगमंच की भूमिका और समाज पर इसके प्रभाव को बताता है। रंगमंच का इतिहास मानव सभ्यता के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है और यह विभिन्न संस्कृतियों में अलग-अलग रूपों में विकसित हुआ।
रंगमंच का औपचारिक इतिहास पश्चिमी सभ्यता में प्राचीन यूनान से शुरू माना जाता है (लगभग 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व)। यहाँ डायोनिसस (शराब और उल्लास के देवता) के सम्मान में नाट्य प्रदर्शन शुरू हुए। एशिलस, सोफोक्लीज़ और यूरिपिडीज़ जैसे नाटककारों ने ट्रैजडी को जन्म दिया, जबकि अरस्तूफेन्स ने कॉमेडी को लोकप्रिय बनाया।
भारत में रंगमंच का इतिहास नाट्यशास्त्र से जुड़ा है, जिसे भरत मुनि ने लगभग 200 ईसा पूर्व से 200 ईस्वी के बीच लिखा। यह विश्व का सबसे पुराना नाट्य सिद्धांत ग्रंथ है। संस्कृत नाटक जैसे कालिदास के "अभिज्ञानशाकुंतलम" और लोक नृत्य-नाटिकाएँ जैसे तमाशा और नौटंकी इस काल में फली-फूली।औपनिवेशिक काल में पाश्चात्य प्रभाव से प्रोसेनियम थिएटर आया, लेकिन स्वतंत्रता के बाद हबीब तनवीर, एब्राहिम अलकाजी और विजय तेंदुलकर जैसे नाटककारों ने भारतीय रंगमंच को नई पहचान दी।
प्राचीन चीन में रंगमंच का विकास तांग राजवंश (618-907 ईस्वी) के दौरान हुआ, जिसमें संगीत, नृत्य और अभिनय का मिश्रण देखने को मिला। बाद में युआन राजवंश (13वीं-14वीं शताब्दी) में ओपेरा शैली विकसित हुई।
यूरोप में मध्ययुग में रंगमंच धार्मिक रूप ले चुका था। "मिस्ट्री प्ले" और "मिरेकल प्ले" चर्च के माध्यम से ईसाई कहानियों को दर्शाते थे। 14वीं-15वीं शताब्दी में पुनर्जागरण ने रंगमंच को फिर से secular (धर्मनिरपेक्ष) बनाया, जिसमें शेक्सपियर जैसे नाटककार उभरे। भारत में इस दौरान भक्ति और सूफी आंदोलनों ने रासलीला और भांड जैसे लोक रंगमंच को जन्म दिया।
यूरोप में 17वीं-18वीं शताब्दी में मोलिएर (फ्रांस) और गोल्डस्मिथ (इंग्लैंड) जैसे लेखकों ने रंगमंच को परिष्कृत किया। ओपेरा और बैले भी लोकप्रिय हुए। वहीं 19वीं शताब्दी में यथार्थवाद का उदय हुआ, जिसमें इब्सन और चेखव जैसे नाटककारों ने सामाजिक मुद्दों को उठाया। 20वीं शताब्दी में रंगमंच प्रयोगात्मक हो गया। ब्रेख्त का "एपिक थिएटर" और स्टैनिस्लाव्स्की की "मेथड एक्टिंग" ने इसे नई दिशा दी। भारत में इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन ने सामाजिक जागरूकता के लिए रंगमंच का उपयोग किया।
आज रंगमंच डिजिटल और मल्टीमीडिया के साथ विकसित हो रहा है। स्ट्रीट थिएटर, इम्प्रोव और इंटरैक्टिव परफॉर्मेंस ने इसे और लोकप्रिय बनाया है। भारत में रंगमंच अब कई क्षेत्रीय भाषाओं में भी समृद्ध है, और कई संस्थान इसे बढ़ावा दे रहे हैं।
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