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UGC का विरोध, सामान्य वर्ग (जनरल कैटेगरी) के बच्चों के भविष्य के लिए !

झूठा/फालतू आरोप लगाने पर कोई विशेष सजा नहीं ! ड्राफ्ट में false/frivolous complaint पर penalty का क्लॉज था, लेकिन फाइनल नियम (जनवरी 2026) में हटा दिया गया—पीड़ित बिना डर के शिकायत करें, इसलिए safeguard नहीं रखा। झूठी शिकायत पर IPC 182/211 (झूठी रिपोर्ट/मानहानि) या कॉलेज के आंतरिक नियम लागू हो सकते हैं, लेकिन UGC में कोई penalty नहीं। अगर SC/ST/OBC छात्र जनरल छात्र को जातिगत भेदभाव करता है UGC नियम में कोई सीधा प्रावधान नहीं। ये एक तरफा  है, जनरल के लिए जाति पर कोई प्रोटेक्शन नहीं।   सामान्य वर्ग (जनरल कैटेगरी) के खिलाफ जातिगत भेदभाव (गाली, बहिष्कार, हारासमेंट) को UGC नियम में कवर नहीं किया गया।  जातिगत भेदभाव की परिभाषा (Regulation 3(c)): सिर्फ SC, ST, OBC के खिलाफ जाति/जनजाति आधारित भेदभाव को कवर करता है।  बच्चों के भविष्य के लिए  अगर जनरल कैटेगरी में बच्चे हैं, तो विरोध/जागरूकता/कानूनी रास्ता अपनाना उचित है—झूठे आरोप  से पढ़ाई/करियर प्रभावित हो सकता है। शांतिपूर्ण तरीके से आवाज उठाएं, ताकि नियम सभी के लिए बराबर और सुरक्षित बनें। ये कदम उठाकर सरकार वि...

कर्मयोग का मार्ग और अर्जुन का संशय

श्रीकृष्ण का उपदेश: कर्तव्य, यज्ञ और कर्म की अनिवार्यता

अर्जुन बोले: हे कृष्ण! अगर आप समझते हैं कि ज्ञान कर्म से बेहतर है, तो मुझे इस डरावने युद्ध में क्यों उलझा रहे हैं!आपके मिश्रित बातों से मेरा दिमाग चकरा रहा है। कृपया एक बात साफ बताएँ, जिससे मेरा भला हो।
श्रीकृष्ण बोले: हे अर्जुन! मैंने पहले बताया था कि इस दुनिया में दो रास्ते हैं—ज्ञानयोग, जो विचारकों के लिए, और कर्मयोग, जो कर्म करने वालों के लिए। कर्म न करने से न तो मुक्ति मिलती है, न ही सिर्फ संन्यास लेने से सिद्धि मिलती है। कोई भी व्यक्ति एक पल के लिए भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। प्रकृति के गुण सबको कर्म करने के लिए मजबूर करते हैं।
जो व्यक्ति बाहर से इंद्रियों को रोकता है, लेकिन मन में सुख-भोगों का विचार करता रहता है, वह मूर्ख और ढोंगी है। लेकिन, हे अर्जुन! जो मन से इंद्रियों को काबू में रखकर, बिना लालच के अपने कर्म करता है, वही श्रेष्ठ है।तुम अपना कर्तव्य निभाओ, क्योंकि कर्म न करना अच्छा नहीं। बिना कर्म किए तो तुम्हारा शरीर भी नहीं चल सकता।यज्ञ (कर्तव्य) के लिए किए कर्म को छोड़कर बाकी सारे कर्म बंधन डालते हैं। इसलिए, हे अर्जुन! बिना स्वार्थ के यज्ञ के लिए कर्म करो। प्रजापति ने सृष्टि की शुरुआत में यज्ञ के साथ प्रजा बनाई और कहा, इस यज्ञ से तुम्हारी प्रगति होगी और यह तुम्हारी इच्छाएँ पूरी करेगा।
उदाहरण:
मान लीजिए, एक व्यक्ति को ऑफिस में प्रोजेक्ट पूरा करना है। वह सोचता है कि काम (कर्म) करने से बेहतर है कि वह सिर्फ योजना बनाए (ज्ञान), क्योंकि काम में मेहनत है (श्लोक 1-2)। लेकिन, श्रीकृष्ण कहते हैं कि कर्म न करना संभव नहीं (श्लोक 3-5)। अगर वह काम टालकर सिर्फ मन में सफलता सोचता है (श्लोक 6), तो वह ढोंगी है। इसके बजाय, अगर वह मन को नियंत्रित कर, बिना नतीजे की चिंता किए, प्रोजेक्ट को कर्तव्य समझकर पूरा करता है (श्लोक 7-8), तो वह सफल होगा। यह काम "यज्ञ" है, जो उसे और कंपनी को आगे बढ़ाएगा (श्लोक 9-10), बिना बंधन डाले।

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