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UGC का विरोध, सामान्य वर्ग (जनरल कैटेगरी) के बच्चों के भविष्य के लिए !

झूठा/फालतू आरोप लगाने पर कोई विशेष सजा नहीं ! ड्राफ्ट में false/frivolous complaint पर penalty का क्लॉज था, लेकिन फाइनल नियम (जनवरी 2026) में हटा दिया गया—पीड़ित बिना डर के शिकायत करें, इसलिए safeguard नहीं रखा। झूठी शिकायत पर IPC 182/211 (झूठी रिपोर्ट/मानहानि) या कॉलेज के आंतरिक नियम लागू हो सकते हैं, लेकिन UGC में कोई penalty नहीं। अगर SC/ST/OBC छात्र जनरल छात्र को जातिगत भेदभाव करता है UGC नियम में कोई सीधा प्रावधान नहीं। ये एक तरफा  है, जनरल के लिए जाति पर कोई प्रोटेक्शन नहीं।   सामान्य वर्ग (जनरल कैटेगरी) के खिलाफ जातिगत भेदभाव (गाली, बहिष्कार, हारासमेंट) को UGC नियम में कवर नहीं किया गया।  जातिगत भेदभाव की परिभाषा (Regulation 3(c)): सिर्फ SC, ST, OBC के खिलाफ जाति/जनजाति आधारित भेदभाव को कवर करता है।  बच्चों के भविष्य के लिए  अगर जनरल कैटेगरी में बच्चे हैं, तो विरोध/जागरूकता/कानूनी रास्ता अपनाना उचित है—झूठे आरोप  से पढ़ाई/करियर प्रभावित हो सकता है। शांतिपूर्ण तरीके से आवाज उठाएं, ताकि नियम सभी के लिए बराबर और सुरक्षित बनें। ये कदम उठाकर सरकार वि...

आज उनका जन्मदिन, जिन्हे प्यार से बाबूजी कहा जाता था


बाबू जगजीवन राम, स्वतंत्रता सेनानी और सामाजिक न्याय के प्रतीक

बाबू जगजीवन राम, जिन्हें प्यार से "बाबूजी" कहा जाता था, भारत के स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख नेताओं में से एक थे और सामाजिक न्याय के लिए उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। उनका जन्म 5 अप्रैल 1908 को बिहार के चंदवा गाँव  वर्तमान भोजपुर जिला में एक दलित परिवार में हुआ था। गरीबी और सामाजिक भेदभाव के बीच पले-बढ़े जगजीवन राम ने अपनी शिक्षा और दृढ़ संकल्प से न केवल अपने जीवन को बदला, बल्कि लाखों लोगों के लिए प्रेरणा बने।

जगजीवन राम ने युवावस्था में ही स्वतंत्रता संग्राम में कदम रखा। वे 1930 के नमक सत्याग्रह और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हुए। उनकी संगठन क्षमता और जनता से जुड़ने की कला ने उन्हें कांग्रेस पार्टी में एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाया। वे अखिल भारतीय दलित लीग के संस्थापक भी थे, जिसके माध्यम से उन्होंने दलितों और वंचित वर्गों की आवाज़ को राष्ट्रीय मंच पर उठाया।

स्वतंत्रता के बाद बाबूजी ने कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। वे भारत के पहले मंत्रिमंडल में श्रम मंत्री बने और बाद में रक्षा, कृषि, और संचार जैसे मंत्रालयों का नेतृत्व किया। 1977 में वे भारत के उप-प्रधानमंत्री बने, जो किसी दलित नेता के लिए पहली बार था। 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान रक्षा मंत्री के रूप में उनकी रणनीति और नेतृत्व ने बांग्लादेश की मुक्ति में अहम भूमिका निभाई।

जगजीवन राम ने जीवन भर जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता के खिलाफ लड़ाई लड़ी। वे शिक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण को वंचित वर्गों के उत्थान का आधार मानते थे। उनकी बेटी मीरा कुमार भी एक प्रमुख राजनेता बनीं और लोकसभा की पहली महिला अध्यक्ष बनीं, जो उनकी प्रेरणादायक विरासत को दर्शाता है।

बाबू जगजीवन राम का जीवन संघर्ष, समर्पण और सेवा की मिसाल है। एक स्वतंत्रता सेनानी, राजनेता और समाज सुधारक के रूप में उनकी उपलब्धियाँ भारत के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखी गई हैं। उनका मानना था कि सच्ची आज़ादी तभी संभव है, जब समाज का हर वर्ग बराबरी का हकदार हो। 

बाबू जगजीवन राम का निधन 6 जुलाई 1986 को दिल्ली में हुआ। उनके सम्मान में कई संस्थानों और योजनाओं का नामकरण किया गया है। वे आज भी सामाजिक समानता और स्वतंत्रता के प्रतीक के रूप में याद किए जाते हैं।

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