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UGC का विरोध, सामान्य वर्ग (जनरल कैटेगरी) के बच्चों के भविष्य के लिए !

झूठा/फालतू आरोप लगाने पर कोई विशेष सजा नहीं ! ड्राफ्ट में false/frivolous complaint पर penalty का क्लॉज था, लेकिन फाइनल नियम (जनवरी 2026) में हटा दिया गया—पीड़ित बिना डर के शिकायत करें, इसलिए safeguard नहीं रखा। झूठी शिकायत पर IPC 182/211 (झूठी रिपोर्ट/मानहानि) या कॉलेज के आंतरिक नियम लागू हो सकते हैं, लेकिन UGC में कोई penalty नहीं। अगर SC/ST/OBC छात्र जनरल छात्र को जातिगत भेदभाव करता है UGC नियम में कोई सीधा प्रावधान नहीं। ये एक तरफा  है, जनरल के लिए जाति पर कोई प्रोटेक्शन नहीं।   सामान्य वर्ग (जनरल कैटेगरी) के खिलाफ जातिगत भेदभाव (गाली, बहिष्कार, हारासमेंट) को UGC नियम में कवर नहीं किया गया।  जातिगत भेदभाव की परिभाषा (Regulation 3(c)): सिर्फ SC, ST, OBC के खिलाफ जाति/जनजाति आधारित भेदभाव को कवर करता है।  बच्चों के भविष्य के लिए  अगर जनरल कैटेगरी में बच्चे हैं, तो विरोध/जागरूकता/कानूनी रास्ता अपनाना उचित है—झूठे आरोप  से पढ़ाई/करियर प्रभावित हो सकता है। शांतिपूर्ण तरीके से आवाज उठाएं, ताकि नियम सभी के लिए बराबर और सुरक्षित बनें। ये कदम उठाकर सरकार वि...

थाली का बदलता स्वाद, परंपरा और आधुनिकता का मेल

प्लांट-बेस्ड मीट से फ्यूज़न डिशेज़ तक, खाने की नई दुनिया

अगर हम अपनी थाली पर नज़र डालें, तो शायद कुछ ऐसा दिखे जो 5-10 साल पहले नहीं था। दाल, चावल, रोटी, और सब्ज़ी की हमारी पारंपरिक थाली में अब नए रंग, स्वाद, और प्रयोग शामिल हो रहे हैं। आज खाने की दुनिया में कई बदलाव साफ़ दिखते हैं। मिसाल के तौर पर, प्लांट-बेस्ड मीट अब सिर्फ विदेशी रेस्तरां तक सीमित नहीं है। दिल्ली, मुंबई, और बेंगलुरु जैसे शहरों में लोग मॉक मीट, कबाब और बर्गर खा रहे हैं। दूसरी तरफ क्विनोआ और चिया सीड्स जैसे सुपरफूड्स हमारी दाल-चावल वाली थाली में जगह बना रहे हैं। 
फूड डिलीवरी ऐप्स ने खाने को बस एक क्लिक की दूरी पर ला दिया है। अब घर में खाना बनाने से ज़्यादा लोग बाहर से ऑर्डर कर रहे हैं। जोमाटो और स्विगी जैसे प्लेटफॉर्म न सिर्फ खाना पहुंचाते हैं, बल्कि क्लाउड किचन्स के ज़रिए नए-नए व्यंजन भी परोस रहे हैं। साथ ही, स्मार्ट किचन गैजेट्स जैसे ऑटोमैटिक रोटी मेकर या एयर फ्रायर हमारी रसोई को बदल रहे हैं।
 त्योहारों पर खाने की मेज़ बदल रही है। जहाँ पहले गुजिया, बिरयानी, और लड्डू ही छाए रहते थे, अब फ्यूज़न डिशेज़ जैसे मसाला-पास्ता या चॉकलेट-समोसा ट्रेंड में हैं। गाँवों में भी लोग लोकल और ऑर्गेनिक सामान की तरफ लौट रहे हैं, जैसे बाजरे की रोटी या गुड़ की मिठाई। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पुराना स्वाद खो रहा है। यह एक मिश्रण है – परंपरा और आधुनिकता का। शायद अगले कुछ सालों में हमारी थाली में और भी प्रयोग दिखें, लेकिन एक बात पक्की है, खाना सिर्फ पेट भरने का ज़रिया नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, सेहत, और समाज का आईना है। खाना, स्वाद, थाली, समाचार

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