बिहार दिवस, इस दिन को हम अपनी समृद्ध संस्कृति, इतिहास और उपलब्धियों को याद करते है
1912 में इसी दिन बिहार को बंगाल प्रेसीडेंसी से अलग करके बनाया गया था। हमारी संस्कृति बेहद समृद्ध और विविधतापूर्ण है, जो प्राचीन काल से लेकर आज तक अपनी अनूठी पहचान बनाए हुए है। अपनी संस्कृति में इतिहास, कला, संगीत, नृत्य, भोजन, और धार्मिक परंपराओं का सुंदर मिश्रण देखने को मिलता है।
बिहार
हमारे देश का एक प्रमुख केंद्र रहा है। यहाँ मगध साम्राज्य, मौर्य और गुप्त वंश ने शासन किया, जिन्होंने भारतीय संस्कृति को गहराई से प्रभावित किया।हमारा बिहार ही ऐसा प्रदेश है जहां बौद्ध और जैन धर्म का उद्गम हुआ ।
यहां बोधगया जहां बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ। राजगीर, नालंदा
और वैशाली जैसे पवित्र स्थान हैं।हिंदू धर्म के लिए भी यहाँ गया जैसे तीर्थस्थल महत्वपूर्ण हैं, जहाँ पितरों के लिए पिंडदान किया जाता है।
यहां मुख्य रूप से भोजपुरी, मगही, मैथिली, और हिंदी बोली जाती हैं। मैथिली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषा का दर्जा प्राप्त है।
मिथिला क्षेत्र का मैथिली साहित्य और कवि विद्यापति की रचनाएँ प्रसिद्ध हैं, जिन्होंने प्रेम और भक्ति काव्य को समृद्ध किया।
मधुबनी चित्रकला (मिथिला पेंटिंग) विश्व प्रसिद्ध कला है। यह रंगीन और जटिल डिज़ाइनों के लिए जानी जाती है, जो आमतौर पर प्रकृति, पौराणिक व धार्मिक कथाओं पर आधारित होती है।सूती और रेशमी कपड़ों की बुनाई, जैसे भागलपुरी सिल्क, भी यहाँ की खासियत है। लोक संगीत में भोजपुरी गीत, सोहर (जन्म के अवसर पर), और विवाह गीत शामिल हैं, जो ग्रामीण जीवन की भावनाओं को व्यक्त करते हैं।हमारे खाने पीने का तरीका सादगी और स्वाद का अनूठा संगम हैं। लिट्टी-चोखा सबसे लोकप्रिय पकवान है, जो भुने हुए आटे के गोले और बैंगन-आलू के मिश्रण से बनता है।सत्तू (भुने चने का आटा), दाल-भात, और मिठाइयाँ जैसे खाजा, तिलकुट, और ठेकुआ भी प्रसिद्ध हैं।छठ पूजा सबसे बड़ा और अनूठा पर्व है, जिसमें सूर्य और प्रकृति की पूजा की जाती है। यह चार दिनों तक चलता है और बड़ी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।हमारी संस्कृति में अभी भी संयुक्त परिवार, आपसी भाईचारा, और मेहमाननवाजी की भावना गहरी जड़ें रखती है। ग्रामीण जीवन यहाँ की संस्कृति का आधार है, जहाँ लोग परंपराओं को आज भी जीवित रखते हैं।हमारी संस्कृति अभी भी अपने गौरवशाली अतीत और वर्तमान के बीच एक पुल का काम कर रही है।
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